मल्लिनाथः
निरुद्धेति ॥ किंच दाशार्हा यादवाः वीवधो धान्यादिप्राप्तिः, आसारः सुहृद्बलम्, प्रसारस्तृणकाष्ठादेः प्रवेशः । `धान्यादेर्वीवधः प्राप्तिरासारस्तु सुहृद्बलम् । प्रसारः तृणकाष्ठादेः प्रवेश:-` इति वैजयन्ती । ते निरुद्धा यैस्ते तथोक्ताः, अन्यत्र निरुद्धौ वीवधानां पर्याहारापरनाम्नां स्कन्धवाह्यक्षीराद्याहरणसाधनभारविशेषाणामासारप्रसारौ प्रवेशनिर्गमौ यैस्ते तथोक्ताः । `विवधो वीवधो भारे पर्याहाराध्वनोरपि` इति हेमचन्द्रः । व्रजं गोष्ठम् । `व्रजः स्याद्गोकुलं गोष्ठम्` इति वैजयन्ती । गा इव माहिष्मतीं पुरीं द्विषोऽरीनुपरुन्धन्तु । व्रजे गा इव माहिष्मत्यामरीन् आवृण्वन्त्वित्यर्थः । `दुहियाचिरुधि-` इति द्विकर्मकत्वम् । तत्र पुरीव्रजाकथितं कर्म, अन्यदीप्सितं कर्म
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | रु | द्ध | वी | व | धा | सा | र |
| प्र | सा | रा | गा | इ | व | व्र | जम् |
| उ | प | रु | न्ध | न्तु | दा | शा | र्हाः |
| पु | रीं | मा | हि | ष्म | तीं | द्वि | षः |
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