मल्लिनाथः
लिलङ्घयिषत इति ॥ लोकांल्लङ्घयितुमिच्छतो लिलङ्घयिषतः । लङ्घयतेः सन्नन्ताल्लटः शतरि शस् । अलङ्घ्यान् स्वयं दुर्लङ्घ्यान् । कुतः । अलघीयसोऽतिगुरून् । अत एव यादवा अम्भोनिधय इवेत्युपमितसमासः । वेलेवेति लिङ्गात् । तान् यादवाम्भोनिधीन् भवतः क्षमा तितिक्षा वेलेव कूलमिव । `वेला कूलेऽपि वारिधेः` इति विश्वः । रुन्धे प्रतिबध्नाति । अन्यथा प्रागेव सर्वं संहरेयुरिति भावः
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लि | ल | ङ्घ | यि | ष | तो | लो | का |
| न | ल | ङ्घ्या | न | ल | घी | य | सः |
| या | द | वा | म्भो | नि | धी | न्रु | न्धे |
| वे | ले | व | भ | व | तः | क्ष | मा |
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