मल्लिनाथः
&#३२; ४२ शिशुपालवधे त्वयीति ॥ त्वयि भूमेरपत्यं पुमांसं भौमं नरकासुरं जेतुं गते सति । स चैद्य इमां पुरीं द्वारकाम् । प्रोषितोऽर्यमा सूर्यो यस्यास्तां मेरोस्तटीं सानुमन्धकार इवारौत्सीत् रुरोध । रुधेरनिटो लुङि सिचि वृद्धिः । उपमालंकारः
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | यि | भौ | मं | ग | ते | जे | तु |
| म | रौ | त्सी | त्स | पु | री | मि | माम् |
| प्रो | षि | ता | र्य | म | णं | मे | रो |
| र | न्ध | का | र | स्त | टी | मि | व |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.