मल्लिनाथः
ककुद्मिति ॥ पुनः । ककुद्मिकन्याया रेवत्या वक्त्रस्यान्तः अभ्यन्तरे वासेन स्थित्या लब्धोऽधिवासो वासना यया तया। तन्मुखसौरभवासितयेत्यर्थः। `संस्कारो गन्धमाल्याद्यैरधिवासनमुच्यते` । मदिरया कृतानुव्याधं कृतसंसर्गम् । प्रियागण्डूषगन्धिनमित्यर्थः । `व्यधजपोरनुपसर्गे-` (अष्टाध्यायी ३.३.६१ ) इत्यनुपसृष्टादप्प्रत्ययविधानादुपसृष्टाद्व्यधेर्घञ्प्रत्ययः । मुखामोदं स्वमुखगन्धविशेषम् । `आमोदः सोऽतिनिर्हारी` इत्यमरः । उद्वमन् उद्गिरन् । अत्र मदिराराममुखगन्धयोः स्वगन्धतिरोधानेन रामामुखतद्गण्डूषमद्यगन्धस्वीकारात्तद्गुणयोस्तत्रोत्तरस्यात्मविशेषकत्वेन पूर्वसापेक्षत्वादङ्गाङ्गिभावेन संकरः। `तद्गुणः स्वगुणत्यागादन्योत्कृष्टगुणाहृतिः` इति लक्षणात्
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | कु | द्मि | क | न्या | व | क्त्रा | न्त |
| र्वा | स | ल | ब्धा | धि | वा | स | या |
| मु | ख | मो | दं | म | दि | र | या |
| कृ | ता | नु | व्या | ध | मु | द्व | मन् |
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