मल्लिनाथः
तमिति ॥ घनया आनन्दसान्द्रया । अनस्तरुचा अक्षीणकान्त्या । सारतया सारत्वेन सर्वोत्कर्षगुणेन यातया व्याप्तया । चारुस्तनया रम्यकुचया ।`स्वाङ्गाच्चो पसर्जनादसंयोगोपधात्` (४|१|५४) इति विकल्पादनीकारः । अनघया निर्दोषया तया प्रसिद्धया श्रिया रमया तरसा त्वरया श्रितमालिङ्गितं तं हरिमुवीक्ष्ये त्युत्तरेण संबन्धः । अत्रापि प्रातिलोम्येनार्धावृत्तेरर्धप्रतिलोमयमकम् । एतल्लक्षणं तु प्रागेवोक्तम्
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | श्रि | या | घ | न | या | न | स्त |
| रु | चा | सा | र | त | या | त | या |
| या | त | या | त | र | सा | चा | रु |
| स्त | न | या | न | घ | या | श्रि | तम् |
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