मल्लिनाथः
अपूर्वयेति ॥ किंच अपूर्वयेव अपूर्वसमागमयेव तत्कालसमागमे सकामया साभिलाषया विजयश्रिया । चैद्यविरक्तयेति भावः । कटाक्षैरपाङ्गैर्दृष्टेनालोकितेन वपुषा राजन्दीप्यमानः । अत्र प्रस्तुतजयश्रीविशेषणसाम्यादप्रस्तुतानुरक्तमानिनीप्रतीतेः समासोक्तिः प्रतीयमानाभेदाध्यवसायादपाङ्गदर्शनोत्प्रेक्षा च
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | पू | र्व | ये | व | त | त्का | ल |
| स | मा | ग | म | स | का | म | या |
| दृ | ष्टे | न | रा | ज | न्व | पु | षा |
| क | टा | क्षै | र्वि | ज | य | श्रि | या |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.