मल्लिनाथः
कृत्तैरिति ॥ कृत्तैः छिन्नैः दन्तिनां दन्तैर्गात्रैश्च कीर्णा मही रणभूमिः क्षुण्णाः पिष्टा लोकासवो जनप्राणा यैस्तैः मृत्योर्मुसलोलूखलैः कीर्णेव रेजे । `अयोग्रं मुसलोऽस्त्री स्यादुदूखलमुलूखलम्` इत्यमरः । अत्र मुसलोलूखलैरिति राजदन्तादिपाठेऽपि `सर्वकूलाभ्र-` (अष्टाध्यायी ३.२.४२ ) इत्यादिसूत्रादेव व्यभिचारज्ञापकात्परनिपातव्यत्ययः
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | त्तैः | की | र्णा | म | ही | रे | जे |
| द | न्तै | र्गा | त्रै | श्च | द | न्ति | नाम् |
| क्षु | ण्ण | लो | का | सु | भि | र्मृ | त्यो |
| र्मु | स | लो | लू | ख | लै | रि | व |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.