मल्लिनाथः
निशितेति ॥ युध्यमानाः संप्रहरन्तः हस्ता येषां सन्तीति हस्तिनः । `हस्ताजाती` (अष्टाध्यायी ५.२.१३३ ) इति निप्रत्ययः । यथा भग्नैर्दन्तैः विषाणैः विहस्ततां हस्तहीनत्वमितिकर्तव्यतामूढत्वं चापुः । `विहस्तव्याकुलौ समा` इत्यमरः । तथा निशिताभिरसिलताभिर्लूनैश्छिन्नैर्हस्तः शुण्डादण्डौर्विहस्ततां नापुः । हस्तेभ्योऽपि दन्तानां प्रहारसाधनत्वादिति भावः । अत्र हस्तस्याच्छेदे वैहस्त्यं न हस्तच्छेदे इति विरोधः प्रतिपत्तिमूढतया समाहित इति विरोधाभासोऽलंकारः
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | शि | ता | सि | ल | ता | लू | नै |
| स्त | था | ह | स्तै | र्न | ह | स्ति | नः |
| यु | ध्य | मा | ना | य | था | द | न्तै |
| र्भ | ग्नै | रा | पु | र्वि | ह | स्त | तां |
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