मल्लिनाथः
राम इति ॥ रिपुर्वेणुदारी आजिमहेषु रणोत्सवेष्विति रूपकम् । `मह उद्धव उत्सवः` इत्यमरः । विचक्षणे प्रगल्भे । विचष्ट इति कर्तरि ल्युडिति न्यासकारः। `असनयोश्च प्रतिषेधो वक्तव्यः` इति चक्षिङः ख्याञादेशाभावः । रामे बलभद्रे शरान् आस चिक्षेप । अस्यतेर्लिट् `अत आदेः` (अष्टाध्यायी ७.४.७० ) इत्यभ्यासदीर्चे सवर्णदीर्घः । कोपात्स राम एनं वेणुदारिणं शितया शातया। `शाच्छोरन्यतरस्याम्` (अष्टाध्यायी ७.४.४१ ) इतीत्वम् । महेष्वा महेषुणा । `पत्री रोप इषुर्द्वयोः` इत्यमरः । विचक्षणे जघान । `क्षणु हिंसायाम्` इति धातोः कर्तरि लिट् । अभिन्नसमपादो नाम पादाभ्यासयमकभेदः। एवमुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम्
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | मे | रि | पुः | श | रा | ना | जि |
| म | हे | ष्वा | स | वि | च | क्ष | णे |
| को | पा | द | थै | नं | शि | त | मा |
| म | हे | ष्वा | स | वि | च | क्ष | णे |
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