मल्लिनाथः
धूतेति ॥ क्षमाभृतां राज्ञा प्रतिष्ठन्त इति प्रष्ठा अग्रेसराः । `सुपि स्थः` (अष्टाध्यायी ३.२.४ ) इति कप्रत्ययः । `प्रष्ठोऽग्रगामिनि` (३९२) इति षत्वे ष्टुत्वम् । धूताः कम्पिता धौता उत्तेजिता असयो यैस्ते धूतधौतासयः सन्तः प्रातिष्ठन्त प्रस्थिताः । `समवप्रविभ्यः स्थः` (अष्टाध्यायी १.३.२२ ) इति तङ् । सा वेला अनुजीविनां शस्त्रजीविनां शौर्यानुरागयोः पुरुषकारस्वामिभक्त्योर्निकषः परीक्षास्थानं हि । अतोऽग्रे स्थातव्यम् । अन्यथा भीरुत्वं स्वामिद्रोहश्च स्यातामिति भावः । वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गम्
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धू | त | धौ | ता | स | यः | प्र | ष्ठाः |
| प्र | ति | ष्ठ | न्त | क्ष | मा | भृ | ताम् |
| शौ | र्य | नु | रा | ग | नि | क | षः |
| सा | हि | वे | ला | नु | जी | वि | नाम् |
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