मल्लिनाथः
उद्धतानिति ॥ उद्धतान् दृप्तान् द्विषतः शत्रून्निघ्नतो हिंसतः । `जासिनिग्रहण-` (अष्टाध्यायी २.३.५६ ) ब्इति सूत्रे निप्रेतिसंघातविपर्यस्तव्यस्तग्रहणोपदेशानिहन्तेरशेषकर्मणि द्वितीयैव । तस्य हरेः शराः । पानार्थे धातौ `पा पाने` इति धातौ सति रुधिरं, रक्षार्थे धातौ `पा रक्षणे` इति भुवनं जगच्चेति द्वितयं ययुः । रुधिरमपिबन् भुवनमरक्षश्चेति श्लेषार्थः । अत्र पानयोरभेदाध्यवसायेन रुधिरभुवनयोस्तुल्ययोगितालंकारः । तत्र `पानार्थे` इत्यादिवाक्यस्य शत्रुवधेन भुवनमरक्षनिति सूक्ष्मार्थगर्भत्वात्सौक्ष्म्यं नाम गुणः । `अतः संकल्परूपत्वं शब्दानां सौम्यमुच्यते` इति लक्षणात्
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द्ध | ता | न्द्वि | ष | त | स्त | स्य |
| नि | ध्न | तो | द्वि | त | यं | य | युः |
| पा | ना | र्थे | रु | धि | रं | धा | तौ |
| र | क्षा | र्थे | भु | व | नं | श | राः |
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