नैरन्तर्यच्छिन्नदेहान्तरालं
दुर्भक्षस्य ज्वालिना वाशितेन ।
योद्धुर्बाणप्रोतमादीप्य मांसं
पाकापूर्वस्वादमादे शिवाभिः ॥
नैरन्तर्यच्छिन्नदेहान्तरालं
दुर्भक्षस्य ज्वालिना वाशितेन ।
योद्धुर्बाणप्रोतमादीप्य मांसं
पाकापूर्वस्वादमादे शिवाभिः ॥
दुर्भक्षस्य ज्वालिना वाशितेन ।
योद्धुर्बाणप्रोतमादीप्य मांसं
पाकापूर्वस्वादमादे शिवाभिः ॥
मल्लिनाथः
नैरन्तर्येति ॥ नैरन्तर्येणाविच्छेदेन छिन्नं देहस्यान्तरालं यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा बाणैः प्रोतं स्यूतम् अत एव दुर्भक्षस्य भक्षितुमशक्यस्य । कृच्छ्रार्थे खल्प्रत्ययः । योद्धुर्योधस्य संबन्धि मांसं ज्वालिना ज्वालावता वाशितेन रुतेन । शिवानां वाशने जिह्वा ज्वलतीति प्रसिद्धिः । आदीप्य प्रज्वाल्य । बाणदाहाय मांसपाकाय चेति भावः । अत एव पाकेनापूर्वोऽभिनवः स्वादो रुचिर्यस्य तत्तथा शिवाभिर्गोमायुभिः । `स्त्रियां शिवा भूरिमायगोमायुमृगधूर्तकाः` इत्यमरः । आदे जघसे । भक्षितमित्यर्थः । `लिट्यन्यतरस्याम्` (अष्टाध्यायी २.४.४० ) इति विकल्पाददेर्न घस्लादेशः । वाशितोत्थया जिह्वाज्वालया दग्धेषुप्रतिबन्धेन पाकरुचिरं जघस इत्यर्थः । अत्र पाकापूर्वास्वादाद्यसंबन्धेऽपि संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नै | र | न्त | र्य | च्छि | न्न | दे | हा | न्त | रा | लं |
| दु | र्भ | क्ष | स्य | ज्वा | लि | ना | वा | शि | ते | न |
| यो | द्धु | र्बा | ण | प्रो | त | मा | दी | प्य | मां | सं |
| पा | का | पू | र्व | स्वा | द | मा | दे | शि | वा | भिः |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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