कश्चिन्मूर्च्छामेत्य गाढप्रहारः
सिक्तः शीतैः शीकरैर्वारणस्य ।
उच्छ्वास प्रस्थिता तं जिघृक्षु-
र्व्यर्थाकूता नाकनारी मुमूर्च्छ ॥
कश्चिन्मूर्च्छामेत्य गाढप्रहारः
सिक्तः शीतैः शीकरैर्वारणस्य ।
उच्छ्वास प्रस्थिता तं जिघृक्षु-
र्व्यर्थाकूता नाकनारी मुमूर्च्छ ॥
सिक्तः शीतैः शीकरैर्वारणस्य ।
उच्छ्वास प्रस्थिता तं जिघृक्षु-
र्व्यर्थाकूता नाकनारी मुमूर्च्छ ॥
मल्लिनाथः
कश्चिदिति ॥ गाढः प्रहारो यस्य सः कश्चिद्वीरो मूर्च्छामेत्य वारणस्य शीतैः शीकरैः पुष्करतुषारैः सिक्तः सन् उच्छश्वास उज्जीवति स्म, किंतु तं मूर्च्छामागतं जिघृक्षुर्ग्रहीतुमिच्छुः । ग्रहेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । प्रस्थिता । तं वरीतुमागतेत्यर्थः । नाकनारी व्यर्थाकूता तदुज्जीवनाद्विफलमनोरथा सती मुमूर्च्छ । अत्राकूतवैयर्थ्यस्य विशेषणगत्या नाकनारीमूर्छाहेतुत्वात्काव्यलिङ्गं मूर्च्चासंबन्धातिशयोक्त्या संकीर्यते
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | श्चि | न्मू | र्च्छा | मे | त्य | गा | ढ | प्र | हा | रः |
| सि | क्तः | शी | तैः | शी | क | रै | र्वा | र | ण | स्य |
| उ | च्छ्वा | स | प्र | स्थि | ता | तं | जि | घृ | क्षु | |
| र्व्य | र्था | कू | ता | ना | क | ना | री | मु | मू | र्च्छ |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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