प्रत्यावृत्तं भङ्गभाजि स्वसैन्ये
तुल्यं मुक्तैराकिरन्ति स्म कश्चित् ।
एकौघेन स्वर्णपुङ्खैर्द्विषन्तः
सिद्धाः माल्यैः साधुवादैर्द्वयेऽपि ॥
प्रत्यावृत्तं भङ्गभाजि स्वसैन्ये
तुल्यं मुक्तैराकिरन्ति स्म कश्चित् ।
एकौघेन स्वर्णपुङ्खैर्द्विषन्तः
सिद्धाः माल्यैः साधुवादैर्द्वयेऽपि ॥
तुल्यं मुक्तैराकिरन्ति स्म कश्चित् ।
एकौघेन स्वर्णपुङ्खैर्द्विषन्तः
सिद्धाः माल्यैः साधुवादैर्द्वयेऽपि ॥
मल्लिनाथः
प्रत्यावृत्तमिति ॥ स्वसैन्ये भङ्गभाजि सति प्रत्यावृत्तमभ्यमित्रं कंचिद्वीर तुल्यमेककालं मुक्तैः स्वर्णपुङ्खै: शरविशेषैः एकौघेन एकप्रहारेण द्विषन्तः आकिरन्ति स्म । सिद्धाः खेचराः माल्यैर्दिव्यमालाभिः । चातुर्वर्ण्यादित्वात्व्यञ्प्रत्ययः । आकिरन्ति स्म । द्वयेऽपि द्विषन्तः सिद्धाश्च साधुवादैः साधु साध्विति वाक्यैराकिरन्ति स्म । एतत्रितयमपि युगपत्प्रवृत्तमित्यर्थः । अत्र स्वर्णपुङ्खसुरमाल्यसाधुवादानां प्रकृतानामेव तुल्यकालैकौघप्रवृत्तिसाम्यादौपम्यावगमात्केवलप्रकृतास्पदा तुल्ययोगिता
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | त्या | वृ | त्तं | भ | ङ्ग | भा | जि | स्व | सै | न्ये |
| तु | ल्यं | मु | क्तै | रा | कि | र | न्ति | स्म | क | श्चित् |
| ए | कौ | घे | न | स्व | र्ण | पु | ङ्खै | र्द्वि | ष | न्तः |
| सि | द्धाः | मा | ल्यैः | सा | धु | वा | दै | र्द्व | ये | ऽपि |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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