आक्रम्यैकामग्रपादेन जङ्घा-
मन्यामुच्चैराददानः करेण ।
संस्थितस्वानं दारुवद्दारुणात्मा
कञ्चिन्मध्यात्पाटयामास दन्ती ॥
आक्रम्यैकामग्रपादेन जङ्घा-
मन्यामुच्चैराददानः करेण ।
संस्थितस्वानं दारुवद्दारुणात्मा
कञ्चिन्मध्यात्पाटयामास दन्ती ॥
मन्यामुच्चैराददानः करेण ।
संस्थितस्वानं दारुवद्दारुणात्मा
कञ्चिन्मध्यात्पाटयामास दन्ती ॥
मल्लिनाथः
आक्रम्येति ॥ दारुणात्मा क्रुद्धचित्तो दन्ती एकां जङ्घामग्रपादेनाक्रम्य अन्यां जङ्घामुच्चैरुन्नतेन करेणाददान आकर्षयन् । सास्थिस्वानं भज्यमानास्थिचटचटाशब्दयुक्तं यथा तथा कंचिद्वीरं दारुवत्काष्ठवन्मध्यात्पाटयामास । मध्यं विभज्य पाटयामासेत्यर्थः । ल्यब्लोपे पञ्चमी । उपमा
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | क्र | म्यै | का | म | ग्र | पा | दे | न | ज | ङ्घा | |
| म | न्या | मु | च्चै | रा | द | दा | नः | क | रे | ण | |
| सं | स्थि | त | स्वा | नं | दा | रु | व | द्दा | रु | णा | त्मा |
| क | ञ्चि | न्म | ध्या | त्पा | ट | या | मा | स | द | न्ती | |
| म | त | त | ग | ग | |||||||
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