हस्तेनाग्रे वीतभीतिं गृहीत्वा
कञ्चिद्व्यालः क्षिप्तवानूर्ध्वमुच्चैः ।
आसीनानां व्योम्नि तस्यैव हेतोः
स्वर्गस्त्रीणामर्पयामास नूनम् ॥
हस्तेनाग्रे वीतभीतिं गृहीत्वा
कञ्चिद्व्यालः क्षिप्तवानूर्ध्वमुच्चैः ।
आसीनानां व्योम्नि तस्यैव हेतोः
स्वर्गस्त्रीणामर्पयामास नूनम् ॥
कञ्चिद्व्यालः क्षिप्तवानूर्ध्वमुच्चैः ।
आसीनानां व्योम्नि तस्यैव हेतोः
स्वर्गस्त्रीणामर्पयामास नूनम् ॥
मल्लिनाथः
हस्तेनेति ॥ व्यालो दुष्टदन्ती । `व्यालो दुष्टगजे सर्पे` इति विश्वः । अग्रे बीतभीतिं निर्भीकम् । भीरोः स्वर्गाभावादिति भावः । कंचिद्वीरं हस्तेन गृहीत्वा ऊर्ध्वमुपर्युच्चैः क्षिप्तवान् । उत्प्रेक्ष्यते-तस्यैव हेतोस्तेनैव हेतुना । तद्धरणार्थमेवे त्यर्थः । `सर्वनाम्नस्तृतीया च` (अष्टाध्यायी २.३.२७ ) इति चकारात्षष्ठीं। व्योम्नि आसीनानामवस्थितानाम् । `ईदासः` (अष्टाध्यायी ७.२.८३ ) इति शानच ईकारः । स्वर्गस्त्री. णाममरनारीणामर्पयामास नूनम्
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | स्ते | ना | ग्रे | वी | त | भी | तिं | गृ | ही | त्वा |
| क | ञ्चि | द्व्या | लः | क्षि | प्त | वा | नू | र्ध्व | मु | च्चैः |
| आ | सी | ना | नां | व्यो | म्नि | त | स्यै | व | हे | तोः |
| स्व | र्ग | स्त्री | णा | म | र्प | या | मा | स | नू | नम् |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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