लब्धस्पर्शं भूव्यधादव्यथेन
स्थित्वा किंचिद्दन्तयोरन्तराले ।
ऊर्ध्वार्धासिच्छिन्नदन्तप्रवेष्टं
जित्वोत्तस्थे नागमन्येन सद्यः ॥
लब्धस्पर्शं भूव्यधादव्यथेन
स्थित्वा किंचिद्दन्तयोरन्तराले ।
ऊर्ध्वार्धासिच्छिन्नदन्तप्रवेष्टं
जित्वोत्तस्थे नागमन्येन सद्यः ॥
स्थित्वा किंचिद्दन्तयोरन्तराले ।
ऊर्ध्वार्धासिच्छिन्नदन्तप्रवेष्टं
जित्वोत्तस्थे नागमन्येन सद्यः ॥
मल्लिनाथः
लब्धस्पर्शमिति ॥ भूव्यधात् । दन्ताभ्यां भुवो विद्धत्वादित्यर्थः । `व्यधज़पोरनुपसर्गे` (अष्टाध्यायी ३.३.६१ ) इत्यप्प्रत्ययः । अव्यथेन स्वयमविद्धत्वादव्यथेन सताsन्येन केनचिद्भटेन दन्तयोरन्तराले किंचिल्लब्धः स्पर्शो यस्मिन्कर्मणि तद्दन्ताभ्यां भटस्पर्श यथा तथा स्थित्वा ऊर्ध्वं प्रसारितेनार्धासिना खड्गैकदेशेन छिन्नश्चूर्णितो दन्तप्रवेष्टो दन्तवेष्टनं यस्य तं नागं जित्वा सद्य एव उत्तस्थे उत्थितम् । भावे लिट् । अत्रापि तथोत्थानाद्यसंबन्धेऽपि संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ल | ब्ध | स्प | र्शं | भू | व्य | धा | द | व्य | थे | न |
| स्थि | त्वा | किं | चि | द्द | न्त | यो | र | न्त | रा | ले |
| ऊ | र्ध्वा | र्धा | सि | च्छि | न्न | द | न्त | प्र | वे | ष्टं |
| जि | त्वो | त्त | स्थे | ना | ग | म | न्ये | न | स | द्यः |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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