दूरोत्क्षिप्तक्षिप्रचक्रेण कृत्तं
मत्तो हस्तं हस्तिराजः स्वमेव ।
भीमं भूमौ लोलमानं सरोषः
पादेनासृक्पङ्कपेषं पिपेष ॥
दूरोत्क्षिप्तक्षिप्रचक्रेण कृत्तं
मत्तो हस्तं हस्तिराजः स्वमेव ।
भीमं भूमौ लोलमानं सरोषः
पादेनासृक्पङ्कपेषं पिपेष ॥
मत्तो हस्तं हस्तिराजः स्वमेव ।
भीमं भूमौ लोलमानं सरोषः
पादेनासृक्पङ्कपेषं पिपेष ॥
मल्लिनाथः
दूरोत्क्षिप्तेति ॥ मत्तो हस्तिराजः करीन्द्रः दूरादुत्क्षिप्तेन प्रास्तेन अत एव क्षिप्रेण सत्वरेण चक्रेण कृत्तं अत एव भूमौ लोलमानं लुठमानम् । लोलतेरनात्मनेपदित्वात् `ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश्` (अष्टाध्यायी ३.२.१२९ ) इति ताच्छील्ये चानश् प्रत्ययः । अत एव `लोलमानादयश्चानशी`ति वामनः । भीमं भयंकर स्वं स्वकीयमेव हस्तं सरोषः सन् पादेनाङ्गिणा असृक्पङ्केन पकीभूतेनासृजा पिनष्टीत्यसृक्पङ्कपेषम् । `स्नेहने पिषः` (अष्टाध्यायी ३.४.३८ ) इति णमुल् । पिपेष । कषादित्वादनुप्रयोगः । रक्तपङ्केन स्नेहद्रव्येण ममर्देत्यर्थः । क्रुद्धमत्तयोः कुतो विवेक इति भावः । अत्र पेषणासंबन्धेऽपि संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दू | रो | त्क्षि | प्त | क्षि | प्र | च | क्रे | ण | कृ | त्तं |
| म | त्तो | ह | स्तं | ह | स्ति | रा | जः | स्व | मे | व |
| भी | मं | भू | मौ | लो | ल | मा | नं | स | रो | षः |
| पा | दे | ना | सृ | क्प | ङ्क | पे | षं | पि | पे | ष |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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