यत्नाद्रक्षन्सुस्थितत्वादनाशं
निश्चत्यन्यश्चेतसा भावितेन ।
अन्त्यावस्थाकालयोग्योपयोगं
दध्रेऽभीष्टं रागमापद्धनं वा ॥
यत्नाद्रक्षन्सुस्थितत्वादनाशं
निश्चत्यन्यश्चेतसा भावितेन ।
अन्त्यावस्थाकालयोग्योपयोगं
दध्रेऽभीष्टं रागमापद्धनं वा ॥
निश्चत्यन्यश्चेतसा भावितेन ।
अन्त्यावस्थाकालयोग्योपयोगं
दध्रेऽभीष्टं रागमापद्धनं वा ॥
मल्लिनाथः
यत्नादिति ॥ अन्यः गजारोहः भावितेनालोचितेन चेतसा सुस्थितत्वादनपायिदेशत्वादनाशमनपायं निश्चित्य यत्नाद्रक्षन् वञ्चकेभ्यस्त्राय(माणः)न् सन् । अन्त्यावस्थाकाले साधनान्तरकाले नाशकाले योग्योपयोगं अत एवाभीष्टं नागं गजमापद्धनं वापद्धनमिव दध्रे अन्यतोऽपसार्य धारयामास । धरते: स्वरितेत्त्वात्कर्तरि लिट् तङ्
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | त्ना | द्र | क्ष | न्सु | स्थि | त | त्वा | द | ना | शं |
| नि | श्च | त्य | न्य | श्चे | त | सा | भा | वि | ते | न |
| अ | न्त्या | व | स्था | का | ल | यो | ग्यो | प | यो | गं |
| द | ध्रे | ऽभी | ष्टं | रा | ग | मा | प | द्ध | नं | वा |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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