यावच्चक्रे नाञ्जनं बोधनाय
व्युत्थानज्ञो हस्तिचारी मदस्य ।
सेनास्वानाद्दन्तिनामात्मनैव
स्थूलास्तावत्प्रावहन्दानकुल्याः ॥
यावच्चक्रे नाञ्जनं बोधनाय
व्युत्थानज्ञो हस्तिचारी मदस्य ।
सेनास्वानाद्दन्तिनामात्मनैव
स्थूलास्तावत्प्रावहन्दानकुल्याः ॥
व्युत्थानज्ञो हस्तिचारी मदस्य ।
सेनास्वानाद्दन्तिनामात्मनैव
स्थूलास्तावत्प्रावहन्दानकुल्याः ॥
मल्लिनाथः
यावदिति ॥ व्युत्थानं गजोत्थापनं जानातीति व्युत्थानज्ञः हस्तिना चरतीति हस्तिचारी यन्ता । मदस्य बोधनायोत्थापनायाञ्जनमुद्दीपनं कर्म यावन्न चक्रे तावत्प्रागेव । असमाप्ते विधावित्यर्थः । सेनास्वानात् । सेनाकलकलश्रवणादित्यर्थः । दन्तिनामात्मना स्वयमेव स्थूला महत्यो दानकुल्या मदसरितः प्रावहन्निति दन्तिनामुत्साहातिरेकोक्तिः । अञ्जनात्प्राग्दानसंबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | व | च्च | क्रे | ना | ञ्ज | नं | बो | ध | ना | य |
| व्यु | त्था | न | ज्ञो | ह | स्ति | चा | री | म | द | स्य |
| से | ना | स्वा | ना | द्द | न्ति | ना | मा | त्म | नै | व |
| स्थू | ला | स्ता | व | त्प्रा | व | ह | न्दा | न | कु | ल्याः |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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