सद्वंशत्वादङ्गसंसङ्गिनीत्वं
नीत्वा कामं गौरवेणाबबब्द्धा ।
नीता हस्तं वञ्चयित्वा परेण
द्रोहं चक्रे कस्यचित्स्वा कृपाणी ॥
सद्वंशत्वादङ्गसंसङ्गिनीत्वं
नीत्वा कामं गौरवेणाबबब्द्धा ।
नीता हस्तं वञ्चयित्वा परेण
द्रोहं चक्रे कस्यचित्स्वा कृपाणी ॥
नीत्वा कामं गौरवेणाबबब्द्धा ।
नीता हस्तं वञ्चयित्वा परेण
द्रोहं चक्रे कस्यचित्स्वा कृपाणी ॥
मल्लिनाथः
सदिति ॥ सद्वंशत्वाच्छुद्धाकरत्वात्कुलीनत्वाच्चाङ्गसंसङ्गिनीत्वमङ्गसंबन्धित्वं नीत्वा । अगुणत्वविवक्षायां `स्वतलोर्गुणवचनस्य` ( वा) इति न पुंवद्भावः । कामं गौरवेणादरेणावबद्धा संयता च कस्यचित्स्वा स्वकीया कृपाणी असिलता। परेणान्येन वञ्चयित्वा प्रतार्य हस्तं नीता स्वायत्तीकृता सती द्रोहं हिंसां व्यभिचारं च चक्रे कृतवती । अत्र प्रकृतकृपाणीविशेषणसाम्यादप्रकृतस्वैरिणीप्रतीतेः समासोक्तिः
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | द्वं | श | त्वा | द | ङ्ग | सं | स | ङ्गि | नी | त्वं |
| नी | त्वा | का | मं | गौ | र | वे | णा | ब | ब | ब्द्धा |
| नी | ता | ह | स्तं | व | ञ्च | यि | त्वा | प | रे | ण |
| द्रो | हं | च | क्रे | क | स्य | चि | त्स्वा | कृ | पा | णी |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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