मिश्रीभूते तत्र सैन्यद्वयेऽपि
प्रायेणायं व्यक्तमासीद्विशेषः ।
आत्मीयास्ते ये पराञ्चः पुरस्ता-
दभ्यावर्ती संमुखो यः परोऽसौ ॥
मिश्रीभूते तत्र सैन्यद्वयेऽपि
प्रायेणायं व्यक्तमासीद्विशेषः ।
आत्मीयास्ते ये पराञ्चः पुरस्ता-
दभ्यावर्ती संमुखो यः परोऽसौ ॥
प्रायेणायं व्यक्तमासीद्विशेषः ।
आत्मीयास्ते ये पराञ्चः पुरस्ता-
दभ्यावर्ती संमुखो यः परोऽसौ ॥
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मि | श्री | भू | ते | त | त्र | सै | न्य | द्व | ये | ऽपि |
| प्रा | ये | णा | यं | व्य | क्त | मा | सी | द्वि | शे | षः |
| आ | त्मी | या | स्ते | ये | प | रा | ञ्चः | पु | र | स्ता |
| द | भ्या | व | र्ती | सं | मु | खो | यः | प | रो | ऽसौ |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
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