पयोमुचामभिपततां दिवि द्रुतं
विपर्ययः परित इवातपस्य सः ।
समक्रमः समविषमेष्वथ क्षणा-
त्क्षमातलं बलजलराशिरानशे ॥
पयोमुचामभिपततां दिवि द्रुतं
विपर्ययः परित इवातपस्य सः ।
समक्रमः समविषमेष्वथ क्षणा-
त्क्षमातलं बलजलराशिरानशे ॥
विपर्ययः परित इवातपस्य सः ।
समक्रमः समविषमेष्वथ क्षणा-
त्क्षमातलं बलजलराशिरानशे ॥
मल्लिनाथः
पयोमुचामिति ॥ अथासुरसेनादर्शनानन्तरं समविषमेषु निम्नोन्नतेषु समक्रमस्तुल्यसंचारः बलजलराशिः सैन्यसागरः दिवि व्योम्नि द्रुतमभिपततामभिधावतां पयोमुचां संबन्धी आतपस्य विपर्ययः छायेव परितः क्षणारक्षमातलं भूतलमानशे । `अशू व्याप्तौ`, `अत आदेः` (७/४/७०) इत्यभ्यासदीर्घः । `अश्नोतेश्च` (७/४/७२) इति नुमागमः । उपमालंकारः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | यो | मु | चा | म | भि | प | त | तां | दि | वि | द्रु | तं |
| वि | प | र्य | यः | प | रि | त | इ | वा | त | प | स्य | सः |
| स | म | क्र | मः | स | म | वि | ष | मे | ष्व | थ | क्ष | णा |
| त्क्ष | मा | त | लं | ब | ल | ज | ल | रा | शि | रा | न | शे |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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