क्षणेन च प्रतिमुखतिग्मदीधिति-
प्रतिप्रभास्फुरदसिदुःखदर्शना ।
भयङ्करा भृशमपि दर्शनीयतां
ययावसावसुरचमूश्च भूभृताम् ॥
क्षणेन च प्रतिमुखतिग्मदीधिति-
प्रतिप्रभास्फुरदसिदुःखदर्शना ।
भयङ्करा भृशमपि दर्शनीयतां
ययावसावसुरचमूश्च भूभृताम् ॥
प्रतिप्रभास्फुरदसिदुःखदर्शना ।
भयङ्करा भृशमपि दर्शनीयतां
ययावसावसुरचमूश्च भूभृताम् ॥
मल्लिनाथः
क्षणेनेति ॥ प्रतिमुखस्याभिमुखस्य तिग्मरश्मेरुष्णांशोः प्रतिप्रभाभिः प्रतिफलितदीप्तिभिः स्फुरद्भिर्देदीप्यमानैरसिभिः खङ्गैर्दुःखं दुष्करं दर्शन यस्याः सा।&#३२; दुर्दर्शेत्यर्थः । असावसुरचमूश्चैद्यसेना क्षणेन च भूभृतां हरिसैनिकानां भृशं भयं करोतीति भयंकरापि । `मेघर्तिभयेषु कृञः` (अष्टाध्यायी ३.२.४३ ) इति खच्प्रत्ययः । दर्शनीयतां मनोहरतामिति विरोधः । दृष्टिविषयतां ययावित्यविरोधः । अत एव विरोधाभासोऽलंकारः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्ष | णे | न | च | प्र | ति | मु | ख | ति | ग्म | दी | धि | ति |
| प्र | ति | प्र | भा | स्फु | र | द | सि | दुः | ख | द | र्श | ना |
| भ | य | ङ्क | रा | भृ | श | म | पि | द | र्श | नी | य | तां |
| य | या | व | सा | व | सु | र | च | मू | श्च | भू | भृ | ताम् |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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