प्रसारिणि सपदि नभस्तले ततः
समीरणभ्रमितपरागरूषिता ।
व्यभाव्यत प्रलयजकालिकाकृति-
र्विदूरतः प्रतिबलकेतनावलिः ॥
प्रसारिणि सपदि नभस्तले ततः
समीरणभ्रमितपरागरूषिता ।
व्यभाव्यत प्रलयजकालिकाकृति-
र्विदूरतः प्रतिबलकेतनावलिः ॥
समीरणभ्रमितपरागरूषिता ।
व्यभाव्यत प्रलयजकालिकाकृति-
र्विदूरतः प्रतिबलकेतनावलिः ॥
मल्लिनाथः
प्रसारिणीति ॥ ततः श्रवणानन्तरं सपद्यविलम्बेन नभस्तले प्रसारिणी व्याप्ता समीरणेन वायुना भ्रमितेन परागेण रूषिता रूक्षीकृता अत एव प्रलयजायाः कल्पान्तप्रादुर्भूतायाः कालिकाया महाकाल्या आकृतिरिवाकृतिर्यस्याः मा प्रतिबले प्रतिपक्षसैन्ये केतनावलिर्ध्वजपङ्क्तिर्विदूरतो दूरादलक्ष्यत । एतावता प्रत्यासत्तिरासीदित्यर्थः । उपमालंकारः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | सा | रि | णि | स | प | दि | न | भ | स्त | ले | त | तः |
| स | मी | र | ण | भ्र | मि | त | प | रा | ग | रू | षि | ता |
| व्य | भा | व्य | त | प्र | ल | य | ज | का | लि | का | कृ | ति |
| र्वि | दू | र | तः | प्र | ति | ब | ल | के | त | ना | व | लिः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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