यथा यथा पटहरवः समीपता-
मुपागमत्स हरिवराग्रतः सरः ।
तथा तथा हृषितवपुर्मुदाकुला
द्विषां चमूरजनि जनीव चेतसा ॥
यथा यथा पटहरवः समीपता-
मुपागमत्स हरिवराग्रतः सरः ।
तथा तथा हृषितवपुर्मुदाकुला
द्विषां चमूरजनि जनीव चेतसा ॥
मुपागमत्स हरिवराग्रतः सरः ।
तथा तथा हृषितवपुर्मुदाकुला
द्विषां चमूरजनि जनीव चेतसा ॥
मल्लिनाथः
यथा यथेति ॥ हरिर्वरो जामातेव हरिवरः । `वरो जामातृवर्ययोः` इति विश्वः । तस्याग्रतः सरतीत्यग्रतःसरोऽग्रेसरः । `पुरोऽग्रतोऽग्रेषु सर्तेः` (अष्टाध्यायी ३.२.१८ ) इति टप्रत्ययः। स पूर्वोक्तः पटहरवो यथा यथा यावद्यावत् समीपतामासन्नतामुपागमत् तथा तथा तावत्तावत् द्विषतां चमूर्जनीव वधूरिव । जनी सीमन्तिनी वधूः` इति विश्वः । चेतसा मुदाकुला आनन्दाविला हृषितवपू रोमाञ्चिताङ्गी । `हृषेर्लोमसु` (अष्टाध्यायी ७.२.२९ ) इतीडागमः । अजनि जाता । जनेः कर्तरि लुङ् `दीपजन(अष्टाध्यायी ३.१.६१ ) इत्यादिना चिण् प्रत्ययः । वधूवरसमागमवत्प्रतिद्वन्द्विसमागमो महोत्साहवर्धनो वीरसेनाया इत्युपमार्थः। तेन सैन्ययोरन्योन्यशब्दश्रवणकारिणी प्रत्यासत्तिरासीदिति व्यज्यते
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | था | य | था | प | ट | ह | र | वः | स | मी | प | ता |
| मु | पा | ग | म | त्स | ह | रि | व | रा | ग्र | तः | स | रः |
| त | था | त | था | हृ | षि | त | व | पु | र्मु | दा | कु | ला |
| द्वि | षां | च | मू | र | ज | नि | ज | नी | व | चे | त | सा |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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