असिच्यत प्रशमितपांशुभिर्मही
मदाम्बुभिर्धृतनवपूर्णकुम्भया ।
अवाद्यत श्रवणसुखं समुन्नम-
त्पयोधरध्वनिगुरु तूर्यमाननैः ॥
असिच्यत प्रशमितपांशुभिर्मही
मदाम्बुभिर्धृतनवपूर्णकुम्भया ।
अवाद्यत श्रवणसुखं समुन्नम-
त्पयोधरध्वनिगुरु तूर्यमाननैः ॥
मदाम्बुभिर्धृतनवपूर्णकुम्भया ।
अवाद्यत श्रवणसुखं समुन्नम-
त्पयोधरध्वनिगुरु तूर्यमाननैः ॥
मल्लिनाथः
असिच्यतेति ॥ धृतौ नवौ पूर्णकुम्भौ शिरःपिण्डकलशौ यया तया द्विपघटया कर्त्र्या । `कुम्भौ घटेभमूर्धांशौ` इत्यमरः । प्रशमितपांशुभिर्मदाम्बुभिर्मही पृथ्वी असिच्यत सिक्ता । आननैर्मुखैः करणैः श्रवणयोः सुखयतीति सुखं सुखकरम् । `सुखहेतौ सुखे सुखम्` इति शब्दार्णवे । समुन्नमत्पयोधरध्वनिगुरु उद्यन्मेघगर्जितगम्भीरं तूर्यमवाद्यत वादितम् । स्वमुखबृंहणैरेव तूर्यं संपादित. मित्यर्थः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | सि | च्य | त | प्र | श | मि | त | पां | शु | भि | र्म | ही |
| म | दा | म्बु | भि | र्धृ | त | न | व | पू | र्ण | कु | म्भ | या |
| अ | वा | द्य | त | श्र | व | ण | सु | खं | स | मु | न्न | म |
| त्प | यो | ध | र | ध्व | नि | गु | रु | तू | र्य | मा | न | नैः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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