उदासिरे पवनविधूतवासस-
स्ततस्ततो गगनलिहश्च केतवः ।
यतः पुरः प्रतिरिपु शार्ङ्गिणः स्वयं
व्यधीयत द्विपघटयेति मङ्गलम् ॥
उदासिरे पवनविधूतवासस-
स्ततस्ततो गगनलिहश्च केतवः ।
यतः पुरः प्रतिरिपु शार्ङ्गिणः स्वयं
व्यधीयत द्विपघटयेति मङ्गलम् ॥
स्ततस्ततो गगनलिहश्च केतवः ।
यतः पुरः प्रतिरिपु शार्ङ्गिणः स्वयं
व्यधीयत द्विपघटयेति मङ्गलम् ॥
मल्लिनाथः
(विशेषकम् ।) उदासिर इति ॥ पवनेन विधूतवाससः कम्पितपटाः गगनलिहोऽभ्रंकषाः केतवो ध्वजाश्च ततस्ततः तत्र तत्र उदासिरे उत्क्षिप्ता इतीत्थं द्विपघटया प्रतिरिपु रिपून्प्रति । आभिमुख्येऽव्ययीभावः । यतो गच्छतः । इणो लटः शत्रादेशः । शार्ङ्गिणः पुरोऽग्रे स्वयं मङ्गलं व्यधीयत विहितम् । अत्र श्लोकत्रये प्रस्तुतद्विपघटविशेषणसाम्यादप्रस्तुतमङ्गलाचरणपरपुरन्ध्रीप्रतीतेः समासोक्तिरलंकारः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | दा | सि | रे | प | व | न | वि | धू | त | वा | स | स |
| स्त | त | स्त | तो | ग | ग | न | लि | ह | श्च | के | त | वः |
| य | तः | पु | रः | प्र | ति | रि | पु | शा | र्ङ्गि | णः | स्व | यं |
| व्य | धी | य | त | द्वि | प | घ | ट | ये | ति | म | ङ्ग | लम् |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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