चलाङ्गुलीकिसलयमुद्धतैः करै-
रनृत्यत स्फुटकृतकर्णतालया ।
मदोदकद्रवकटभित्तिसङ्गिभिः
कलस्वरं मधुपगणैरगीयत ॥
चलाङ्गुलीकिसलयमुद्धतैः करै-
रनृत्यत स्फुटकृतकर्णतालया ।
मदोदकद्रवकटभित्तिसङ्गिभिः
कलस्वरं मधुपगणैरगीयत ॥
रनृत्यत स्फुटकृतकर्णतालया ।
मदोदकद्रवकटभित्तिसङ्गिभिः
कलस्वरं मधुपगणैरगीयत ॥
मल्लिनाथः
चलेत्यादि ॥ स्फुटं कृतः कर्णतालः कर्णताडनं यया तया द्विपघटया का चलाङ्गुल्य एव किसलया यस्मिन्कर्मणि तत्तथोद्धतैः करैर्हस्तैरनृत्यत अनर्ति । भावे लङ् । तथा मदोदकेन द्रवास्वार्द्रासु कटभित्तिषु गण्डस्थलेषु सङ्गिभिरासक्तैः मधुपगणैर्भमरगणैः कलस्वरं मधुरस्वरमगीयत गीतम् । भावे लङ्
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | ला | ङ्गु | ली | कि | स | ल | य | मु | द्ध | तैः | क | रै |
| र | नृ | त्य | त | स्फु | ट | कृ | त | क | र्ण | ता | ल | या |
| म | दो | द | क | द्र | व | क | ट | भि | त्ति | स | ङ्गि | भिः |
| क | ल | स्व | रं | म | धु | प | ग | णै | र | गी | य | त |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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