मुहुः प्रतिस्खलितपरायुधा युधि
स्थवीयसीरचलनितम्बनिर्भराः ।
अदंशयन्नरहितशौर्यदंशना-
स्तनूरयं नय इति वृष्णिभूभृतः ॥
मुहुः प्रतिस्खलितपरायुधा युधि
स्थवीयसीरचलनितम्बनिर्भराः ।
अदंशयन्नरहितशौर्यदंशना-
स्तनूरयं नय इति वृष्णिभूभृतः ॥
स्थवीयसीरचलनितम्बनिर्भराः ।
अदंशयन्नरहितशौर्यदंशना-
स्तनूरयं नय इति वृष्णिभूभृतः ॥
मल्लिनाथः
मुहुरिति ॥ वृष्णिभूभृतो यादवनरेन्द्राः मुहुरसकृद्युधि प्रतिस्खलितपरायुधाः भग्नप्रतिपक्षायुधाः स्थवीयसीः स्थूलतराः । पराक्रमानुरूपप्रकर्षवतीरित्यर्थः । `स्थूलदूर-` (अष्टाध्यायी ६.४.१५६ ) इत्यादिना पूर्वस्य गुणलोपौ । अचलनितम्बनिर्भरा अद्रिकटकनिबिडाः । अन्तःसारवतीरित्यर्थः । अरहितमव्यक्तं शौर्यमेव दंशनं वर्म यासां तास्तनूर्देहान् अयं नय इति वर्मधारणं नीतिरिति हेतोः न तु भयादिति भावः । अदंशयन्नवर्मयन् । दंशेरनुदात्तेत्वात्परस्मैपदं चिन्त्यमित्याहुः । अत एव भट्टमल्लः-`संवर्मयति संनह्यत्यात्मने सज्जतीत्यमी । संदंशते दंशयते संनाहे पदपञ्चकम् ॥` इति । केचित्तु चुरादिषूभयपदिषु पठन्ति । अत्र साभि प्रायविशेषणत्वात्परिकरालंकारः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | हुः | प्र | ति | स्ख | लि | त | प | रा | यु | धा | यु | धि |
| स्थ | वी | य | सी | र | च | ल | नि | त | म्ब | नि | र्भ | राः |
| अ | दं | श | य | न्न | र | हि | त | शौ | र्य | दं | श | ना |
| स्त | नू | र | यं | न | य | इ | ति | वृ | ष्णि | भू | भृ | तः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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