विवर्तयन्मदकलुषीकृते दृशौ
कराहतक्षितिकृतभैरवावरवः ।
क्रुधा दधत्तनुमतिलोहिनीमभू-
त्प्रसेनजिद्गज इव गैरिकारुणः ॥
विवर्तयन्मदकलुषीकृते दृशौ
कराहतक्षितिकृतभैरवावरवः ।
क्रुधा दधत्तनुमतिलोहिनीमभू-
त्प्रसेनजिद्गज इव गैरिकारुणः ॥
कराहतक्षितिकृतभैरवावरवः ।
क्रुधा दधत्तनुमतिलोहिनीमभू-
त्प्रसेनजिद्गज इव गैरिकारुणः ॥
मल्लिनाथः
विवर्तयन्निति ॥ मदो मद्यविकारो दानं च । `मदो मद्येभदानयोः` इति विश्वन कलुषीकृत आकुलीकृते दृशौ विवर्तयन्पूर्णयन्करेण पाणिना शुण्डा. दण्डेन चाहतायां क्षितौ भूमौ कृतो भैरवारवो भयंकरध्वनिर्येन सः । क्रोधात्सध्वानं करेण क्षितिमाघ्नन्नित्यर्थः । क्रुधा क्रोधेन अतिलोहिनीमतिलोहिताम् । लिट् ।&#३२; `वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः` (१९३९) इति विकल्पान्ङीष् तकारस्य च नकारः । तनुं वपुर्दधत्प्रसेनजिन्नाम राजा गैरिकारुणो धातुरक्तो गज इवाभूत् । तद्वदलक्ष्यतेत्यर्थः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | व | र्त | य | न्म | द | क | लु | षी | कृ | ते | दृ | शौ | |
| क | रा | ह | त | क्षि | ति | कृ | त | भै | र | वा | व | र | वः |
| क्रु | धा | द | ध | त्त | नु | म | ति | लो | हि | नी | म | भू | |
| त्प्र | से | न | जि | द्ग | ज | इ | व | गै | रि | का | रु | णः | |
| ज | भ | स | ज | ग | |||||||||
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