विचिन्तयन्नुपनतमाहवं रसा-
दुरः स्फुरत्तनुरुहमग्रपाणिना ।
परामृशत्कठिनकठोरकामिनी-
कुचस्थलप्रमुषितचन्दनं पृथुः ॥
विचिन्तयन्नुपनतमाहवं रसा-
दुरः स्फुरत्तनुरुहमग्रपाणिना ।
परामृशत्कठिनकठोरकामिनी-
कुचस्थलप्रमुषितचन्दनं पृथुः ॥
दुरः स्फुरत्तनुरुहमग्रपाणिना ।
परामृशत्कठिनकठोरकामिनी-
कुचस्थलप्रमुषितचन्दनं पृथुः ॥
मल्लिनाथः
विचिन्तयन्निति ॥ पृथु म राजा उपनतं प्राप्तमाहवं युद्धं रसागणरागा. द्विचिन्तयन् कदेति ध्यायन् कठिनेन कर्कशेन कठोरेण प्रवृद्धेन कामिन्याः कुचस्थलेन प्रमुषितमपहृतं चन्दनं यस्य तत् । एतेनास्य सुरतसमरयोः समरसत्वं व्यज्यते । अत एव स्फुरत्तनुरुहमुदञ्चत्पुलकमुरः अग्रश्चासौ पाणिश्चेति समानाधिकरणसमासः । अत एव `हस्ताग्राग्रहस्तादयो गुणगुणिनोभेंदाभेदयो रिति वामनः । तेनाप्रपाणिना पाणितलेन परामृशत्परामृष्टवान् । रणकण्डूलपाणित्वादिति भावः । अत एव यदन्येषां रोषजनकं दूतवाक्यं तदागामिरणकारणतयास्य हर्षहेतुरिति श्लोकार्थः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | चि | न्त | य | न्नु | प | न | त | मा | ह | वं | र | सा |
| दु | रः | स्फु | र | त्त | नु | रु | ह | म | ग्र | पा | णि | ना |
| प | रा | मृ | श | त्क | ठि | न | क | ठो | र | का | मि | नी |
| कु | च | स्थ | ल | प्र | मु | षि | त | च | न्द | नं | पृ | थुः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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