दुरीक्षतामभजत मन्मथस्तथा
यथा पुरा परिचितदाहधार्ष्ट्याया ।
ध्रुवं पुरः सशरममुं तृतीयया
हरोऽपि न व्यसहत वीक्षितुं दृशा ॥
दुरीक्षतामभजत मन्मथस्तथा
यथा पुरा परिचितदाहधार्ष्ट्याया ।
ध्रुवं पुरः सशरममुं तृतीयया
हरोऽपि न व्यसहत वीक्षितुं दृशा ॥
यथा पुरा परिचितदाहधार्ष्ट्याया ।
ध्रुवं पुरः सशरममुं तृतीयया
हरोऽपि न व्यसहत वीक्षितुं दृशा ॥
मल्लिनाथः
दुरीक्षतामिति ॥ मन्मथः प्रद्युम्नावतारः कामस्तथा दुरीक्षतां दुर्दिनत्वम् । ईक्षतेः खलन्तात्तल्प्रत्ययः । अभजत । यथा हरोऽपि पुरा पूर्वजन्मनि परिचितमभ्यस्तं दाहधाष्ट्यं दहनसाहसं यस्यास्तया तृतीयया दृशा सशरममुं मन्मर्थ ध्रुवं पुनर्वीक्षितुं न व्यसहत न शक्तः । `परिनिविभ्यः सेवसितसयसिवुसहसुदः स्तुस्वञ्जाम्` (८३३७०) `सिवादीनां वाड्व्यवायेऽपि` (अष्टाध्यायी ८.३.७१ ) इति विकल्पान्ने पत्वम् । अनयोत्प्रेक्षया रुद्रस्यापि भीषणः किमुतान्येषामिति वस्तु व्यज्यते
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दु | री | क्ष | ता | म | भ | ज | त | म | न्म | थ | स्त | था |
| य | था | पु | रा | प | रि | चि | त | दा | ह | धा | र्ष्ट्या | या |
| ध्रु | वं | पु | रः | स | श | र | म | मुं | तृ | ती | य | या |
| ह | रो | ऽपि | न | व्य | स | ह | त | वी | क्षि | तुं | दृ | शा |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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