विच्छित्तिर्नवचन्दनेन वपुषो भिन्नोऽधरोऽलक्तकै-
रच्छाच्छे पतिताञ्जने च नयने श्रोण्योऽलसन्मेखलाः ।
प्राप्तो मौक्तिकहारमुन्नतकुचाभोगस्तदीयद्विषा-
मित्थं नित्यविभूषणा युवतयः संपत्सु चापत्स्वपि ॥
विच्छित्तिर्नवचन्दनेन वपुषो भिन्नोऽधरोऽलक्तकै-
रच्छाच्छे पतिताञ्जने च नयने श्रोण्योऽलसन्मेखलाः ।
प्राप्तो मौक्तिकहारमुन्नतकुचाभोगस्तदीयद्विषा-
मित्थं नित्यविभूषणा युवतयः संपत्सु चापत्स्वपि ॥
रच्छाच्छे पतिताञ्जने च नयने श्रोण्योऽलसन्मेखलाः ।
प्राप्तो मौक्तिकहारमुन्नतकुचाभोगस्तदीयद्विषा-
मित्थं नित्यविभूषणा युवतयः संपत्सु चापत्स्वपि ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | च्छि | त्ति | र्न | व | च | न्द | ने | न | व | पु | षो | भि | न्नो | ऽध | रो | ऽल | क्त | कै |
| र | च्छा | च्छे | प | ति | ता | ञ्ज | ने | च | न | य | ने | श्रो | ण्यो | ऽल | स | न्मे | ख | लाः |
| प्रा | प्तो | मौ | क्ति | क | हा | र | मु | न्न | त | कु | चा | भो | ग | स्त | दी | य | द्वि | षा |
| मि | त्थं | नि | त्य | वि | भू | ष | णा | यु | व | त | यः | सं | प | त्सु | चा | प | त्स्व | पि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.