परितः प्रमिताक्षरापि सर्वं
विषयं व्याप्तवती गता प्रतिष्ठाम् ।
न खलु प्रतिहन्यते कुतश्चि-
त्परिभाषेव गरीयसी यदाज्ञा ॥
परितः प्रमिताक्षरापि सर्वं
विषयं व्याप्तवती गता प्रतिष्ठाम् ।
न खलु प्रतिहन्यते कुतश्चि-
त्परिभाषेव गरीयसी यदाज्ञा ॥
विषयं व्याप्तवती गता प्रतिष्ठाम् ।
न खलु प्रतिहन्यते कुतश्चि-
त्परिभाषेव गरीयसी यदाज्ञा ॥
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | तः | प्र | मि | ता | क्ष | रा | पि | स | र्वं | |
| वि | ष | यं | व्या | प्त | व | ती | ग | ता | प्र | ति | ष्ठाम् |
| न | ख | लु | प्र | ति | ह | न्य | ते | कु | त | श्चि | |
| त्प | रि | भा | षे | व | ग | री | य | सी | य | दा | ज्ञा |
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