मल्लिनाथः
निशमय्येति ॥ एनसामनाप्तुरसंस्प्रष्टुः । सत्यवादिन इति भावः । आप्नोतेस्तृच् । शिनेः शिनिनाम्नः कस्यचिद्यादवस्य नप्तुः पौत्रस्य । सात्यकेरिति भावः । तदूर्जितमर्थयुक्तं वचनं निशमय्य श्रुत्वा । `ल्यपि लघुपूर्वात्` (अष्टाध्यायी ६.४.५६ ) इति णेरयादेशः । पुनर्भूयोऽप्युज्झितसाध्वसं त्यक्तभयं यथा तथा द्विषां वचो हरतीति वचोहरो दूतः । `हरतेरनुद्यमनेऽच्` । (अष्टाध्यायी ३.२.९ ) वचोऽभिधत्ते स्म अभिहितवान्
छन्दः
गीतिः
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | श | म्य | त | दू | र्जि | तं | शि | ||||
| ने | र्व | च | नं | न | प्तु | र | ना | प्तु | रे | न | साम् |
| पु | न | रु | ज्झि | त | सा | ध्व | सो | द्वि | |||
| षा | म | भि | ध | त्ते | स्म | व | चो | व | चो | ह | रः |
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