मल्लिनाथः
&#३२; दधत इति ॥ मेदिनीभृतो राजानः । धूमपटलेन पिहितस्य छादितस्य अत एव भयानकतरत्वमतिभयंकरत्वमुपगतवतो गिरेः समानतां सादृश्यं दधतो दधानाः सपदि समवर्मयन् संवर्मयन्ति स्म । सम्यग्वर्मणानहन्नित्यर्थः । `सत्यापपाश-` (अष्टाध्यायी ३.१.२५ ) इत्यादिना णिच् । उपमालंकारः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | ध | तो | भ | या | न | क | त | र | त्व | |||
| मु | प | ग | त | व | तः | स | मा | न | ताम् | |||
| धू | म | प | ट | ल | पि | हि | त | स्य | गि | रेः | ||
| स | म | व | र्म | य | न्स | प | दि | मे | दि | नी | भृ | तः |
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