मल्लिनाथः
&#३२; क्षणमिति ॥ असौ चैद्यः पथि किमिदमिति मिथः जल्पता कोऽयमनर्थः संवृत्त इति परस्परमालपता जनेन क्षणमीक्षितः सन् शिबिरं स्वकटकं प्राप्याविशङ्किमना निःशङ्कचित्तः द्रुतं शीघ्रमनीकिनीं सेनां समनीनहत् संनाहयति स्म । नह्यतेः संपूर्वकाल्लुङि `णौ चड्युपधाया ह्रस्वः` (अष्टाध्यायी ७.४.१ ) अभ्यासदीर्घश्च । शिबिरं शकटमिति केचित् । एतेनास्य रौद्रस्थायिनः कोपस्य प्ररूढत्वं वेदितव्यम्
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्ष | ण | मी | क्ष | तः | प | थि | ज | ने | न | |||
| कि | मि | द | मि | ति | ज | ल्प | ता | मि | थः | |||
| प्रा | प्य | शि | बि | र | म | वि | श | ङ्कि | म | नाः | ||
| स | म | नी | न | ह | द्द्रु | त | म | नी | कि | नी | म | सौ |
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