मल्लिनाथः
गुर्विति ॥ अथैष चेदिपः फणवान्फणीव । गुर्वधिकं निःश्वसन्फूत्कुर्वन् विलोलं सदवथु ससंतापम् । `संतापो दवथुः` इत्यनेकार्थादिति सज्जनः । तद्वपुर्यस्य स विलोलसदवथुवपुः । `ट्वितोऽथुच्` (अष्टाध्यायी ३.३.८९ ) । कीर्णा विक्षिप्ता दशनकिरणा अग्निकणा इव यस्य स तथा सन् वचो विषमिव तद्वचोविषं विससर्ज । विषप्रायं वच उज्जगारेत्यर्थः । अतः फणवानिवेति व्यस्तोपमालिङ्गात्सर्वत्रोपमितसमासाश्रयणम्
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गु | रु | निः | श्व | स | न्न | थ | वि | लो | ल | |||
| स | द | व | थु | व | पु | र्व | चो | वि | षम् | |||
| की | र्ण | द | श | न | कि | र | णा | ग्नि | क | णः | ||
| फ | ण | वा | नि | वै | ष | वि | स | स | र्ज | चे | दि | पः |
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