मल्लिनाथः
कुपितेष्विति ॥ रथचरणपाणेश्चक्रपाणेः पूजया राजसु तथा कुपितेष्वपि चित्ते कलितं निश्चितं कलहागमनं युद्धलाभो येन स आहुकिः आहुकिर्नाम राजा शोभनं हृदयं यस्य स सुहृन्मित्रमिव । कृष्णपक्षपातीवेत्यर्थः । `सुहृदुर्हृदौ मित्रामित्रयोः` (अष्टाध्यायी ५.४.१५० ) इति निपातः । अधिकां मुदं दधौ संतोषं धृतवान् । सुदुःसहोऽपि कृष्णोत्कर्षः कलहकण्डूलबाहोराहुकेः मोदहेतुरासीदित्यर्थः । उपमालंकारः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | पि | ते | षु | रा | ज | षु | त | था | पि | |||
| र | थ | च | र | ण | पा | णि | पू | ज | या | |||
| चि | त्त | क | लि | त | क | ल | हा | ग | म | नो | ||
| मु | द | मा | हु | किः | सु | हृ | दि | वा | धि | कां | द | धौ |
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