मल्लिनाथः
प्रतिघ इति ॥ प्रतिघः कोपः । `कोपक्रोधामर्षरोषप्रतिघा-` इत्यमरः । कुतोऽपि समुपेत्यागत्य नरपतिगणं राजमण्डलं समाश्रयत्समाविशत् । रुक्मिणस्तु जामिः स्वसा । `जामिः स्वसूकुलस्त्रियोः` इत्यमरः । तस्या रुक्मिण्या हरणेन जनितोऽनुशयो `हा कष्टमापन्नं ! कदा निर्यातयामि` इत्यनुतापो यस्मिन्सः । `अथानुशयो दीर्घद्वेषानुतापयोः` इत्यमरः । निजो नित्य एव प्रतिघः । `निजमात्मीयनित्ययोः` इति विश्वः । समुदाचचार समुद्दिदीपे । भीष्मवाक्यमन्येषां कोपोत्पादकमासीत्, रुक्मिणस्तु प्रागेवावरूढकोपस्योद्दीपकमासीदित्यर्थः । अत्रानुशयस्य विशेषणगत्या कोपोद्दीपनहेतुत्वात्काव्यलिङ्गभेदः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ति | घः | कु | तो | ऽपि | स | मु | पे | त्य | |||
| न | र | प | ति | ग | णं | स | मा | श्र | यत् | |||
| जा | मि | ह | र | ण | ज | नि | ता | नु | श | यः | ||
| स | मु | दा | च | चा | र | नि | ज | ए | व | रु | क्मि | णः |
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