मल्लिनाथः
स्मृतीति ॥ विद्विषश्चैद्यस्य संबन्धि समस्तमपकृतमपकारजातम् । नपुंसके भावे क्तः । तस्य हरेः कृष्णस्य स्मृतिपथं नेयाय न प्राप । न तमपकारं सस्मारेत्यर्थः । अर्थान्तरं न्यस्यति-अधिगतगुणस्मरणाः परिचितोपकारस्मृतय उत्तमाः सजना अखिलं दोषमपकारं स्मर्तुं न पटवः खलु । नालं भवन्तीत्यर्थः । `पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु` (अष्टाध्यायी ३.४.६६ ) इति तुमुन्प्रत्ययः । उपकारमेव स्मरन्ति साधवो नापकारमित्यर्थः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्मृ | ति | व | र्त्म | त | स्य | न | स | म | स्त | |||
| म | प | कृ | त | मि | या | य | वि | द्वि | षः | |||
| स्म | र्तु | म | धि | ग | त | गु | ण | स्म | र | णाः | ||
| प | ट | वो | न | दो | ष | म | खि | लं | ख | लू | त्त | माः |
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