मल्लिनाथः
स इति ॥ रुषा रोषेणाश्रु वमन्मुञ्चन् । घनेन सान्द्रेण घर्मेण क्रोधोष्मणा विगलत्स्रवदुरु महत् गण्डमण्डलं यस्य सः । स्विद्यत्कपोल इत्यर्थः । स्वेदजलकणैः स्वेदबिन्दुभिः करालकरो दन्तुरहस्तः स चैद्यः त्रिधा नेत्रकपोलहस्तदेशैः प्रभिन्नो मदस्रावी मत्तः । `प्रभिन्नो मत्तः स्यात्` इति वैजयन्ती । कुञ्जर इव व्यरुचत् । रुचेः `दयुद्भ्यो लुङि` (१|३।९१) इति विकल्पात्परस्मैपदम् । एतेन स्वेदाख्यः सात्विकभाव उक्तः । उपमालङ्कारः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | व | म | न्रु | षा | श्रु | घ | न | घ | र्म | |||
| वि | ग | ल | दु | रु | ग | ण्ड | म | ण्ड | लः | |||
| स्वे | द | ज | ल | क | ण | क | रा | ल | क | रो | ||
| व्य | रु | च | त्प्र | भि | न्न | इ | व | कु | ञ्ज | र | स्त्रि | धा |
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