यः कोलतां बल्लवतां च बिभ्र-
द्दंष्ट्रामुदस्याशु भुजां च गुर्वीम् ।
मग्नस्य तोयापदि दुस्तरायां
गोमण्डलस्योद्धरणं चकार ॥
यः कोलतां बल्लवतां च बिभ्र-
द्दंष्ट्रामुदस्याशु भुजां च गुर्वीम् ।
मग्नस्य तोयापदि दुस्तरायां
गोमण्डलस्योद्धरणं चकार ॥
द्दंष्ट्रामुदस्याशु भुजां च गुर्वीम् ।
मग्नस्य तोयापदि दुस्तरायां
गोमण्डलस्योद्धरणं चकार ॥
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यः | को | ल | तां | ब | ल्ल | व | तां | च | बि | भ्र |
| द्दं | ष्ट्रा | मु | द | स्या | शु | भु | जां | च | गु | र्वीम् |
| म | ग्न | स्य | तो | या | प | दि | दु | स्त | रा | यां |
| गो | म | ण्ड | ल | स्यो | द्ध | र | णं | च | का | र |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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