निष्प्रहन्तुममरेशविद्विषा-
मर्थितः स्वयमथ स्वयंभुवा ।
सम्प्रति श्रयति सूनुतामयं
कश्यपस्य वसुदेवरूपिणः ॥
निष्प्रहन्तुममरेशविद्विषा-
मर्थितः स्वयमथ स्वयंभुवा ।
सम्प्रति श्रयति सूनुतामयं
कश्यपस्य वसुदेवरूपिणः ॥
मर्थितः स्वयमथ स्वयंभुवा ।
सम्प्रति श्रयति सूनुतामयं
कश्यपस्य वसुदेवरूपिणः ॥
मल्लिनाथः
निष्प्रहन्तुमिति ॥ अथ रामावतारानन्तरं अयं हरिः अमरेशविद्विषां निष्पहन्तुम् । चैद्यादीनिन्द्रशत्रून् हन्तुमित्यर्थः। `जासिनिप्रहण-` (अष्टाध्यायी २.३.५६ ) इत्यादिना कर्मणि षष्ठी । स्वयंभुवा ब्रह्मणा स्वयमात्मनैवार्थितः प्रार्थितः सन् संप्रतीदानी वसुदेवरूपिणो वसुदेवमूर्तिधरस्य कश्यपस्य पुत्रतां श्रयति व्रजति कृष्णरूपेणेति&#३२; भावः । अत्र स्वयंभूप्रार्थनाया विशेषणगत्या वसुदेवपुत्रताप्राप्तिहेतुत्वात्पदार्थहेतुकं काव्यलिङ्गम्
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | ष्प्र | ह | न्तु | म | म | रे | श | वि | द्वि | षा |
| म | र्थि | तः | स्व | य | म | थ | स्व | यं | भु | वा |
| स | म्प्र | ति | श्र | य | ति | सू | नु | ता | म | यं |
| क | श्य | प | स्य | व | सु | दे | व | रू | पि | णः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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