मल्लिनाथः
दिव्येति ॥ दिव्यकेसरिवपुर्दिव्यसिंहमूर्तिः । एष हरिः आयुधैर्वज्रादिभिरपि नैव लब्धशममप्राप्तशान्ति । दुर्निवारा दुर्जया रणकण्डूर्यस्य तत् । रणव्यसनीत्यर्थः । `गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य` (अष्टाध्यायी १.२.४८ ) इति ह्रस्वः । सुरद्विषो हिरण्यकशिपोर्वक्षः कोमलैर्नखैः निरदारयदभिनत् । वज्राद्यभेद्यस्य कोमलनखविदार्यत्वं भगवत्प्रभावादिति विरोधाभासोऽलंकारः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दि | व्य | के | स | रि | व | पुः | सु | र | द्वि | षो |
| नै | व | ल | ब्ध | श | म | मा | यु | धै | र | पि |
| दु | र्नि | वा | र | र | ण | क | ण्डु | को | म | लै |
| र्व | क्ष | ए | ष | नि | र | दा | र | य | न्न | खैः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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