मल्लिनाथः
स्कन्धेति ॥ स्थूलनासिकवपुर्वराहमूर्तिरयं हरिः स्कन्धस्य कंधरायाः धूननेन कम्पनेन विसारिभिरुत्सर्पिभिः केसरैः सटाभिः क्षितोऽवकीर्णः सागरस्य महाप्लवो महापूरः यस्यास्ताम् । जलापसारेण प्रकाशितामित्यर्थः । वसुंधरां भुवं मुहूर्तं क्षणमात्रम् । `मुहूर्तमल्पकालेऽपि` इति शब्दार्णवे । उद्धृतामनावृतत्वात्सागरादुत्क्षिप्तामिव ऐक्षत प्रेक्षितवानित्युत्प्रेक्षा । ईक्षतेर्लङि `आडजादीनाम्` (अष्टाध्यायी ६.४.७२ ) `आटश्च` (अष्टाध्यायी ६.१.९० ) इति वृद्धिः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्क | न्ध | धू | न | न | वि | सा | रि | के | स | र |
| क्षि | प्त | सा | ग | र | म | हा | प्ल | वा | म | यम् |
| उ | द्धृ | ता | मि | व | मु | हू | र्त | मै | क्ष | त |
| स्थू | ल | ना | सि | क | व | पु | र्व | सु | न्ध | राम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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