मल्लिनाथः
स्नातकमिति ॥ स्नातको गृहस्थविशेषस्तम् , गुरुं पित्रादिकम् , अभीष्टमिष्टबन्धुम्, ऋत्विजं याजकम्, संयुज्यत इति संयुक् संबन्धी जामाता तेन सह मेदिनीपतिं राजानं च । तं च मेदिनीपतिं चेत्यर्थः । षट् षडेतेऽर्घभाजः पूजा इति । इतिशब्देनाभिहितत्वान्न कर्मणि द्वितीया यथाह वामनः-`निपातेनाप्यभिहिते कर्मणि न कर्मविभक्तिः परिगणनस्य प्रायिकत्वात्` इति । कीर्ययन्ति कथयन्ति । वृद्धा इति शेषः । न च ते दूर इत्याह-ते च षडपि ते तव सदः सभां युगपदागताः प्राप्ताः । अत्र स्नातकादीनां प्रकृतानामेवार्घभाक्त्वसाधादौपम्यावगमात्तुल्ययोगिताभेदः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्ना | त | कं | गु | रु | म | भी | ष्ट | मृ | त्वि | जं |
| सं | यु | जा | च | स | ह | मे | दि | नी | प | तिम् |
| अ | र्घ | भा | ज | इ | ति | की | र्त | य | न्ति | ष |
| ट्ते | च | ते | यु | ग | प | दा | ग | ताः | स | दः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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