एक एव वसु यद्ददौ नृप-
स्तत्समापकमतर्क्यत क्रतोः ।
त्यागशालिनि तपःसुते ययुः
सर्वपार्थिवधनान्यपि क्षयम् ॥
एक एव वसु यद्ददौ नृप-
स्तत्समापकमतर्क्यत क्रतोः ।
त्यागशालिनि तपःसुते ययुः
सर्वपार्थिवधनान्यपि क्षयम् ॥
स्तत्समापकमतर्क्यत क्रतोः ।
त्यागशालिनि तपःसुते ययुः
सर्वपार्थिवधनान्यपि क्षयम् ॥
मल्लिनाथः
एक इति ॥ एक एव नृपो यद्वसु धनं ददौ । उपायनमिति भावः । तद्धनमेव क्रतोः समापकं संपूरकमतर्क्यत । दक्षिणादानादिसर्वक्रतुव्ययपर्याप्ततया तर्कितमित्यर्थः । तपःसुते धर्मपुत्रे त्यागशालिनि सति सर्वपार्थिवधनान्यपि क्षयं व्ययं ययुः । अत्रैकपार्थिवधनस्य क्रतुसमापकत्वासंबन्धेऽपि तत्संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः । तयोश्च सापेक्षत्वात्सजातीयसंकरः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | क | ए | व | व | सु | य | द्द | दौ | नृ | प |
| स्त | त्स | मा | प | क | म | त | र्क्य | त | क्र | तोः |
| त्या | ग | शा | लि | नि | त | पः | सु | ते | य | युः |
| स | र्व | पा | र्थि | व | ध | ना | न्य | पि | क्ष | यम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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