वारिपूर्वमखिलासु सत्क्रिया-
लब्धशुद्धिषु धनानि बीजवत् ।
भावि बिभ्रति फलं महद्द्विज-
क्षेत्रभूमिषु नराधिपोऽवपत् ॥
वारिपूर्वमखिलासु सत्क्रिया-
लब्धशुद्धिषु धनानि बीजवत् ।
भावि बिभ्रति फलं महद्द्विज-
क्षेत्रभूमिषु नराधिपोऽवपत् ॥
लब्धशुद्धिषु धनानि बीजवत् ।
भावि बिभ्रति फलं महद्द्विज-
क्षेत्रभूमिषु नराधिपोऽवपत् ॥
मल्लिनाथः
}} वारीति ॥ नराधिपो राजा सत्क्रियाभिरभिषेकसंस्कारैर्लब्धा शुद्धिर्निर्दोषता याभिस्तास्वखिलासु । द्विजा एव क्षेत्रभूमयः केदारभूमयस्तासु । `क्षेत्रं गेहे पुरे देहे केदारे योनिभार्ययोः` इति वैजयन्ती । भावि भविष्यन्महत्फलं स्वर्गादिकं धान्यादिकं च बिभ्रति । बिभ्राणानीत्यर्थः । `वा नपुंसकस्य` (अष्टाध्यायी ७.१.७९ ) इति विकल्पान्नुमागमप्रतिषेधः । धनानि बीजवद्बीजैस्तुल्यं वारिपूर्वमुदकदानपूर्वकमवपदुप्तवान् । दत्तवानित्यर्थः । अत्र बीजवदित्युपमानम् `तेन तुल्यम्-` (अष्टाध्यायी ५.१.११५ ) इति तुल्यार्थे वतेर्विधानात् । तथापि वापक्रियायोगाद्द्विजक्षेत्रेति रूपकसमासो नोपमितसमासः । किंतु रूपकस्याङ्गमुपमा तदुत्थापितत्वादिति संकरः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वा | रि | पू | र्व | म | खि | ला | सु | स | त्क्रि | या |
| ल | ब्ध | शु | द्धि | षु | ध | ना | नि | बी | ज | वत् |
| भा | वि | बि | भ्र | ति | फ | लं | म | ह | द्द्वि | ज |
| क्षे | त्र | भू | मि | षु | न | रा | धि | पो | ऽव | पत् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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